Saturday, December 5, 2020

सूखे पत्ते

 सूखे पत्ते ऐसे हवा में उड़ जाते 

मानो बेफिक्री की हद सी

थोड़े गिरते थोड़े संभलते अपने खत्म होने का इंतजार यूं करते 

मानो जर्जर बुढ़ापे सी

रंग भी धूप से वो यूं बदलते 

मानो ज़िन्दगी से ही रूठी सी

अंत में कहीं बगीचे में खाद बनकर 

पेड़ से अलग होकर भी नीयत पेड़ो वाली ना छोड़कर

जहां मिट्टी में मिले उसे ही आबाद कर

और फिर किसी और पौधे कि जड़ से रेंगते रेंगते 

फिर से पत्ते बनकर

कभी पीपल कहीं नीम

 सूखे पत्ते हवा में यूं आजाद उड़े

मानो उन्हें मालूम हो कि उनका वजूद है अनंत तक !

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