सूखे पत्ते ऐसे हवा में उड़ जाते
मानो बेफिक्री की हद सी
थोड़े गिरते थोड़े संभलते अपने खत्म होने का इंतजार यूं करते
मानो जर्जर बुढ़ापे सी
रंग भी धूप से वो यूं बदलते
मानो ज़िन्दगी से ही रूठी सी
अंत में कहीं बगीचे में खाद बनकर
पेड़ से अलग होकर भी नीयत पेड़ो वाली ना छोड़कर
जहां मिट्टी में मिले उसे ही आबाद कर
और फिर किसी और पौधे कि जड़ से रेंगते रेंगते
फिर से पत्ते बनकर
कभी पीपल कहीं नीम
सूखे पत्ते हवा में यूं आजाद उड़े
मानो उन्हें मालूम हो कि उनका वजूद है अनंत तक !
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