Monday, August 31, 2020

बेवजह मुस्कुराऊं

 अल्लाह करम हो कि वो बेवजह मुस्कुराए, अनोखा है 

दिल में टीस लिए नकली मुस्कान दिखाए तो धोखा है ! 

मन गुदगुदाए तो मुस्कुराने को क्यूं रोका जाए

मगर दिल दर्द से भर आए तो रोने से क्यूं टोका जाए

जन्नत तो उस फकीरी में है

जब सुख दुख तमाशा नज़र आए 

जब ना दुख का बहिष्कार हो, ना सुख का तिरस्कार

जो सब में रमता है, वो उजागर हो जाए

ना मैं रहूं, ना तुम रहो, सब सब हो जाए

मन अपने ही मन में रम जाए और बेवजह बेपरवाह हो जाए ! 

या अल्लाह, सब सूफियाना लगे, और खुद भी सूफी हो जाए !

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