वो पल,
जब ज़ेहन कौंध उठी बगावत को
जज़्बात उफन पड़े ऐसे कि भेद मिटे
तो सबूत मिला कि जिंदा था मैं
वो पल
जब अहम की ऊंचाई को समतल कर
अपराध बोध के बोझ को धूं जला
कहीं झुक कर, तो कहीं गले लग
इंसानी कायदे की दीवारें टाप
दासत्व, हार, प्रेम सब स्वीकारा था
तब जिया था मैं
वो पल
जब फिक्र के बादल को फूंक मार
औरों के पैमाने से ना माप कर
बस मुस्कुराता चला था
तब बढ़ा था मैं
वो पल
जब फिक्र में छिपा कोई मतलब नही,
सच बोलने में डर नहीं
आरोप पर विस्मय नहीं
प्रशस्ति में भी मगन नही
तब जगा था मैं
वो पल
जब जीत में भी झुका था
और हार में सिद्दत थी
संताप में उसकी रहमत थी
और मौत से भी जुदा था
तब जाना था
तब जिया था मैं
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