Not a poem
नेकनामी या बदनामी की परवाह, वादे से किसी का मुकरना, दिल टूटना, शहर की रुसवाई
ये सब बातें गर परेशां करती
तो मैं कलम उठाता, कविता करता
खुद भी समझता, उन्हें भी समझाता
अब यकीं है, सब गोरखधंधा है
मान लिया है, जो है सो है
सोच रखा है, जो हो सो हो
सबकी कहानी में मैं हूं उनके मुताबिक
मेरी कहानी में सब हैं मेरे मुताबिक
सोचा इस कहानी को और क्यूं उलझाऊँ
क्यूं और सतही बातें बनाऊं
इंकार भी क्यूं जताऊं, आमंत्रण भी क्यूं दोहराऊं
इतने सोच पोच से राह और क्यूं कठिन बनाऊं
हर गुजरते, मिलते पथिक को खैरियत बख्शे ईश्वर मेरा, और उनके खुदा को भी नमन मेरा !
गौरव
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