Tuesday, April 21, 2020

झुकना कैसा ?

सर  झुका सा गया था
 लाचारी में
 भाव उलझे थे, द्वंद था
उस पल में
ऐसे कश्मकश में जीना
आसान है
जीत होती है अहंकार की
संतुष्ट होता है अभिमान
लाचारी का दोष मढ़ कर
नहीं तो स्वयं को कोस कर
मैं बड़ा हूं, में जीत जाऊंगा
कैसी हिम्मत उसकी? औकात बतलाऊंगा
मन टहलाता है मन को बहरूपिए सच से
की मैं सही और यही सही
की प्रकृति में समभाव नहीं
मुझे कम, उसके जितना नहीं
नकार भरे मन को बड़ा आराम है
सर झुक के भी झुका नहीं है
दो रास्ते और निकलते हैं
एक स्वीकार का और एक सजदे का
स्वीकार में शुद्ध मन अशुद्धता को रियायत से
दायित्व का रास्ता बतलाएगा
और सर असल में झुक जाएगा
दूसरा रास्ता में थका मन उस आका की
पुकार लगाएगा
एक पाक रोशनी में घुल जाएगा
क्षमा की छाया पाएगा
और सजदे में झुक जाएगा
ये झुकना झुकना है
ये सजदा खालिस है !


गौरव 

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