Saturday, October 26, 2019

समय

समय क्या मात्र एक खेल है
क्षण, युगों, अनंत का मेल है
जो कुछ भी है इस पल
वो अगले पल नहीं भी
समय की परिसीमा में जब  धरती  भी नगण्य है
हम, तुम, इमारतें, आकांक्षाएं क्या नहीं सभी शून्य है

पर इस शून्य में भी अहंकार है
हीनता के अनगिनत प्रकार है
संसार में कई मन और मन में कई संसार हैं
हलाहल बेचैनी, पटकती होड़ क्यूं
जब शून्यता ही सार है
खोया व्यक्तित्व और भागता संसार क्यूं
जब भस्म ही तो सार है
हार में जब शांति है तो विजय की इतनी हुंकार क्यूं

सच जब चुप है तो झूठ के इतने प्रकार क्यूं

तपस यूं धीर है तो वासना निर्बांध क्यूं

श्वास ही तो रुकी है अभी, पर समय तो असीमित है
तो हवन क्यूं जाप क्यूं या मरण का भाव क्यूं

ये खेल ही तो था समय का जिसमे तनिक विराम है
दो छोर में बंधी हुई दो ओर से  खीचती
 जीवन की कसाकस में अंतता का भाव क्यों

 उठेगा वीर पुनः, अगले समय को चिड़ता, भाग्य को निचोड़ता, सिर्फ एक ओर दौड़ता, सत्यता को सोखता, मरण को भी चीरता, प्रकाश ही बिखेरता, हीनता को रौंदता, स्वार्थ को  ढकेलता और समय को भी पछाड़ता और उस शून्यता को पाता !

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