Thursday, October 24, 2019

करेंगे हिसाब मिलकर

इच्छाएं बढ़ती जा रही है
ज़िन्दगी सिकुड़ सी गई है
अपने ही मन का बोझ इतना भारी है
की ज़िन्दगी कुचल सी गई है !
पहले अतिथि बिन बताए आते थे
छोटी बड़ी बिस्किट के डब्बे
और बचे हुए हलवे में हीं
 खुशियां छोड़ जाते थे
पुरानी चादर खींच कर बैठते थे
WhatsApp का जमाना ना था
मन की बातें साथ में विचारते थे
सीख के गुड़ से सनी किस्से परोसते थे

अब तनी चादर, नए फर्नीचर पे मिलते है
उनके बिन बताए आने का दुख तो होता है
पर चेहरे पे मस्कुरहाट फिट सी होती है
पकवानों के बीच सिर्फ अपनी उपलब्धियों और आैरों के कमियां बिखेरते है !

सोचो अगर फुलवारी के गुलाब, गेंदे से जलने लगे
आम को नीम का परोस में रहना ना भाए 
एक पेड़ पे सिर्फ तोते हो और गौरैयों को घोसला नसीब ना हो
तितलियों को शहद देने कहा जाए

मानवीय विभिन्नताओं के बीच बस रहे एकरूपता को तोड़ने को कहा जाए
चलो मैं अपने मन की करता हूं
तुम्हारी परवाह क्यों
तुम अपनी इच्छाएं पूरी करो
हमें हस्तक्षेप क्यों
मैं अपने में रहूं, तुम अपने लिए रहो
मरते वक़्त में खुद श्मशान पहुंच जाऊं
या बेजान शरीर को कंधा क्यूं

फिर उस पार मिलेंगे और हिसाब करेंगे
अनगिनत रिश्तों में आई सिलवटों का 
पड़ोस की बिलखन का जो सुनी नहीं
चाचा के उस अरमान का की मरने से पहले एक बार मिल लेता
हिसाब करेंगे
अपने अभिमान का, नकली मुस्कान का ,
हिसाब करेंगे की
कितनी दूर आ गए जीवन से और अपने स्वरूप से
हिसाब करेंगे हर उपलब्धियों का
की कितना पाया और कितना खो गया
तौलेंगे अपने रूह कि वो कितना भीग गया
और कितना सूख गया !

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