Tuesday, April 30, 2019

ना भस्म हुआ ना ध्वस्त हुआ

शब्दों को आकार दिया
उन शब्दों का व्यापार किया
पर सत्य का रूप नहीं बदला
ना भस्म हुआ ना ध्वस्त हुआ

सफलता यूं आ टपकी
तब सारा श्रेय वार लिया
स्वरचित स्वरूप की पुष्टि में
कई झूठ रचे कई सत्य ढके
कई जमीनी रिश्ते तोड़े और  नए रिश्तों में नकली मुस्कान भरी
पर सत्य कभी ना भस्म हुआ
सतरूप कभी ना नष्ट हुआ

कुरूपता  और जीवन के अंधेरे पन्नों पर
अन्नभिज्ञता का लेप गढ़ा
कई दाग भी डायन से निकले
अकेली रातों में प्रहार किया
कुछ सत्य कहे कुछ मंत्र गढे
कठिन लम्हों ने यथार्थता को उभार दिया
मैंने भी छुपने छुपाने का खेल छोड़
सत्य को आमंत्रित किया
कुरूपता को स्वीकार किया
दोषों का उत्तरदायित्व ले
स्वयं का मूल्यांकन किया
दुनिया की पुरानी रीत है
 दोषों में अफवाह की लेप लगा दोगुनी उजागर करने की
मैंने उसे भी स्वीकार किया
खुशियों को तो सलाम मेरा
हर गम को भी आभार मेरा
एक सत्य जो निरंतर अद्भुत है
उसका ही अनुसंधान किया
बाह्य भय आडंबर ढहते गए
मन की पीड़ा को भी आराम मिला।
सत्य कभी ना भस्म हुआ और नहीं  नाराज़ हुआ।
और  निकट आता ही गया और हृदय को भी विश्राम मिला।

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