Monday, December 3, 2018

दोस्ती !

ना समझाने का फिक्र था
ना समझने का ज़िक्र
उथली हंसी और नकली ठहाको के बीच
मुद्दा तो ना जाने कब का पीछे  हुआ था
आगे था तो अहम की तुष्टि, व्यर्थ अधिकार, और अनकही ललकार
जब वक़्त समय के साथ समझौते की थी,
तब बगावत की भूख थी
और जब  कहना था कुछ, तब
मीठी gossip, बनावटी बातो का बोलबाला था !
या तो ना समझना था किसी को और ना समझाना था
यहां तो कभी खुद को ऊपर
तो कभी किसी को नीचा दिखाना था
जनाब,
दोस्ती में, कमियों पे खुशमिजाजी का रफू चलाया जाता है
यहां चलती थी व्यंग और अहम की तलवार
और दोस्ती hi hello bye ya  chai pe Nahi चलती
अपितु इसके ऊपर होता है एक विश्वास
चलो बहुत कर ली बातें
ना समझना था मुझे ना समझाना
उस दिन में आज तलक
मैं नासमझ ही था और नासमझ ही रहूंगा




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