दो दिन वॉलेट में वो नोट और टिके
इस खातिर
बराबर मूल्य वाले पुराने नोट लोगो को देता रहा
ना जाने कैसा स्वार्थ था उसे !
कुछ सेकंड बचेंगे ,
इस वजह
जल्दी से कतार में किसी के आगे लग गया
भले कितनी दफा सात बोल के आठ बजे पहुंचा होगा
ना जाने कैसा पाबंद था वो !
एक दस का सिक्का निकालकर वापस रख लिया था
वजह ये की देना पांच था
वो इंपोर्टेड इत्र हज़ार का था
ना जाने कैसा हिसाब था ये !
दोस्तों से आफिस की शिकायत करी की हफ्ते में ६ दिन बुलाते है
और रूपा महीने में दो से ज्यादा छुट्टी ना करे
वरना पैसे कटने की हिदायत थी
ना जाने कैसा बवाल था ये !
कोर्ट में वकालत करते थे
जनाब न्याय के लिए लड़ते थे
घर के मामले में तो लिंग जांच हुई
वो तो कुछ कह भी ना सका
कैसा बेजुबान था वो !
क्या हम भी बेजुबान बने रहे !
इस खातिर
बराबर मूल्य वाले पुराने नोट लोगो को देता रहा
ना जाने कैसा स्वार्थ था उसे !
कुछ सेकंड बचेंगे ,
इस वजह
जल्दी से कतार में किसी के आगे लग गया
भले कितनी दफा सात बोल के आठ बजे पहुंचा होगा
ना जाने कैसा पाबंद था वो !
एक दस का सिक्का निकालकर वापस रख लिया था
वजह ये की देना पांच था
वो इंपोर्टेड इत्र हज़ार का था
ना जाने कैसा हिसाब था ये !
दोस्तों से आफिस की शिकायत करी की हफ्ते में ६ दिन बुलाते है
और रूपा महीने में दो से ज्यादा छुट्टी ना करे
वरना पैसे कटने की हिदायत थी
ना जाने कैसा बवाल था ये !
कोर्ट में वकालत करते थे
जनाब न्याय के लिए लड़ते थे
घर के मामले में तो लिंग जांच हुई
वो तो कुछ कह भी ना सका
कैसा बेजुबान था वो !
क्या हम भी बेजुबान बने रहे !
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