इन पहाड़ों को सदियों से निष्पक्ष खड़ा देख
सोचा गहरे मौन की अनुभूति कैसी होगी
इनके बीच नदियों को स्वच्छंद बहता देख
सोचा विनम्र होकर स्वतंत्र चलने का आनंद कैसा होगा
शिवालिक को अपनी गोद में गुलमोहर बसाए देख
सोचा कैसे प्रकृति ने हर जगह ममत्व पिरोया है
नर नारायण पर्वत के बीच गोरैये को गोते लगाते देख
सोचा एक नन्ही चिड़ियां कैसे पहाड़ को पाड़ कर जाती है
काले हरे भूरे पहाड़ों पे हिम का श्रंगार देख
सोचा प्यासे को तृप्ति का लेप लगा हो
जी चाहता
आनंदमई प्रकृति को निहारते रहूं और प्रकृति हो जाऊ
ठंडी हवाओं को रूह तक महसूस करूं और तर जाऊ
पहाड़ों में ऊंचे बसे एक नन्ही सी कुटिया में जैसा जीवन
ऐसा इच्छमुक्त जीवन हो जाए
सोचा गहरे मौन की अनुभूति कैसी होगी
इनके बीच नदियों को स्वच्छंद बहता देख
सोचा विनम्र होकर स्वतंत्र चलने का आनंद कैसा होगा
शिवालिक को अपनी गोद में गुलमोहर बसाए देख
सोचा कैसे प्रकृति ने हर जगह ममत्व पिरोया है
नर नारायण पर्वत के बीच गोरैये को गोते लगाते देख
सोचा एक नन्ही चिड़ियां कैसे पहाड़ को पाड़ कर जाती है
काले हरे भूरे पहाड़ों पे हिम का श्रंगार देख
सोचा प्यासे को तृप्ति का लेप लगा हो
जी चाहता
आनंदमई प्रकृति को निहारते रहूं और प्रकृति हो जाऊ
ठंडी हवाओं को रूह तक महसूस करूं और तर जाऊ
पहाड़ों में ऊंचे बसे एक नन्ही सी कुटिया में जैसा जीवन
ऐसा इच्छमुक्त जीवन हो जाए
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