Saturday, June 9, 2018

आग की लपट सी

ये जरूरतें और ख्वाहिशें है
या सियासी मामले
ना कम होते है
ना ख़तम !

ना उलझन मिटती है
ना बेचैनी घटती है
एक ये भी पूरी हो जाए
वो पुरानी भी अधूरी ना रहे

इच्छाएं ये कभी
लहकती हुई आग की लपट सी
तो कभी बुझती हुई राख चिंगारी लिए
जलाती हुई हर ओर से ही

उस केवट को देखो
उसे तो सिर्फ एक नाव मिली
बहता पानी और एक कच्ची छत
कभी सवारी मिली तो कभी नहीं 
फिर वो  क्यूं नहीं जल रहा
उसके चेहरे पे सिकन क्यूं नहीं
वो निश्चिंत कैसे
और ये क्या
वो हर बात पे किस बात के लिए
किसी खुदा को शुक्र अदा कर रहा
यहां दौड़ और तन्हाई
उसे कैसे सुकून और ठहराव

खैर
मेरी अगली चाहत तो मीलों दूर दिख रही
थोड़ी बेचैनी और बढ़ानी होगी
तब वो नसीब हो शायद
और तब मै भी कहीं  ठहर उस केवट की तरह नदी निहारते छांव में आराम करूंगा !
खुदा को करम भी मान लूंगा !

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