जले कुछ भी होता अंत राख ही है
पर हर राख अलग सुगंध लिए है
जो ये बताती है कि जला क्या है
कहीं भस्म है तो कहीं अंत्येष्ठि
कभी खाक है तो कभी विभूति !
बने कुछ भी , जो जल जायो तो
बचता नहीं कुछ बजाए राख के
जिस राख का ना तो कोई व्यक्तित्व है
ना ही पहचान के तमाम तगमे
ना अधिकार बचता है ना बर्चस्व
बचता है तो बस एक सत्व , एक मूल
एक सुगंध , एक सार !
जो ये बताती है कि जला क्या है
!
जो ये बताती है कि सार क्या है !
ये काश की में वो विभूति हो जाऊ
जिसमे मै नहीं सिर्फ मेरे आका की सुगंध हो !
पर हर राख अलग सुगंध लिए है
जो ये बताती है कि जला क्या है
कहीं भस्म है तो कहीं अंत्येष्ठि
कभी खाक है तो कभी विभूति !
बने कुछ भी , जो जल जायो तो
बचता नहीं कुछ बजाए राख के
जिस राख का ना तो कोई व्यक्तित्व है
ना ही पहचान के तमाम तगमे
ना अधिकार बचता है ना बर्चस्व
बचता है तो बस एक सत्व , एक मूल
एक सुगंध , एक सार !
जो ये बताती है कि जला क्या है
!
जो ये बताती है कि सार क्या है !
ये काश की में वो विभूति हो जाऊ
जिसमे मै नहीं सिर्फ मेरे आका की सुगंध हो !

No comments:
Post a Comment