Friday, April 6, 2018

जो रुकोगे नहीं तो देखोगे कैसे ?

जो रुकोगे नहीं तो देखोगे कैसे
की बिजलियां कैसे चमकती है
बादल कैसे गरजते है
टहनियां कैसे झूमती है
पत्ते कैसे मचलते है

प्रकृति जो आनंदमई है
कालमयी क्षण में हो जाए
नहीं तो ये जानोगे कैसे
की जीवन प्रकृति की उदारता है
जीवन प्रकृति का ही  दान है !!

जो रुकोगे नहीं तो जानोगे कैसे
की वो एक छोटी बात कल तक जेहन में कौंधती थी
सरल जीवन को जटिल बनाती थी
एक समर्थ को लाचार बनाती  थी
पूर्णता में अभाव दिखाती थी

माथे पे छत , मनपसंद निवाला
फरमाइशई ज़िन्दगी फिर भी परेशान
जो रुकोगे नहीं तो जानोगे कैसे
बारिश में वो बिन छत तड़पता है
नुक्कड़ पे कोई भूखे बिलखता है

हां जानोगे कैसे
 देने के काबिल हो तुम मांगने के अधिकारी नहीं
की अब कभी बेवजह लाचारी नहीं
अब कभी बेवजह लाचारी नहीं

जो रुकोगे नहीं तो जानोगे कैसे
की एक पत्ते से टप कर गिर बूंदों से
कैसे दूसरे पत्ते भींगते है
फूल कैसे मासूम बच्चे की तरह
बढ़ते और खिलखिलाते है
की वो गार्ड की मूछें कितनी तनती है
बिटिया की शादी के बाद उसकी
ज़िन्दगी कैसे बितती है

दर्द बेशुमार है
और खुशियां भी हज़ार
जो रुकोगे नहीं तो जानोगे कैसे
की किस कोने में है और दर्द कितना है
किस सिरहाने है और खुशी कितनी है
जो रुकोगे नहीं तो जानोगे कैसे
की ज़िन्दगी कितनी भारी है
और कितनी हलकी है !!
जो रुकोगे नहीं तो जानोगे कैसे !!
की ज़िन्दगी कितनी गहरी है और कितनी गहरी है !
Gaurav

No comments: