Friday, December 1, 2017

शर्तिया इश्क़

हमने ज्यों का त्यों रख दिया ख़ुद को
पड़ोस दिया अपनी ज़िंदादिली और अपने
ख़ालीपन को भी
अपनी ख़ूबियों को और अपने मन की बदसूरती को भी
इश्क़ की दही जमी ही थी
की बातें बदलती गयी
मेरे अस्तित्व से प्यार कब मेरे व्यक्तित्व पे फिसल गया
वादे शर्तों में बदलने लगे
चाहतों की व्यापारी भी शुरू हुई
कुछ मेरे सपने तुम पूरे करो
कुछ तुम्हारे मैं
ये बदमाश मन कहता रहा
क्या चाहते एक नहीं हो सकती
और उसे साथ में पूरा करें
ये भी ज़्यादती होती
हर व्यक्ति आज़ाद है
अपनी चाहतें बनाने के लिए और उसे
सवारने के लिए भी
ऐसा भी कर सकते है क्या
की सब अपनी चाहतें पूरी करें
पर उसके पूरे होने की ख़ुशी साथ में बटें
और उसके बिखरने का ग़म भी एक सोफ़े  सिमटे
शर्तिया अगर प्यार भी हो जाए
तो ज़िंदगी बिन प्यार भली
जज़्बात अगर सतही हो जाए
तो ज़िंदगी बिन जज़बात सही
.....

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