तू जान पे खेलकर जो दिवालो में रंग भरता है !तब कही जाकर ये इमारत चमकता है !
तू अपने नन्हें बच्चों को पीठ पे रख ईंट उठाता है , तब जाकर कही ये इमारत उठता है !!
और जब तुझे ही इन बहुमंज़िली से कोई नीचा देखता है तो मेरा जी दहलता है
और जब तेरे बच्चों को ही स्कूल नहीं मिलता रोटी नहीं मिलती तो ख़ून खौलता है !
ख़ैर ये कविता मेरी तेरे दुख को बताना नहीं
अपितु तेरे सामने आभार जताने का है तुझे सम्मान देने और दिलाने का है !
तू बनाए ये इमारत और तुझे इसे छूने का हक़ नहीं
तू ही उगाहे अन्न और तुझे भरपेट खाने का हक़ नहीं
तू ही करे सफ़ाई हर ओर और तुझे साफ़ कपडे नहीं
तू काम करे बनाने का तो जो बिगाड़े वो तुझे मजदूर क्यूँ खुदा क्यूँ ना कहे ||

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