Wednesday, November 3, 2010

कुछ और ......

रास्ते कब याद रहते हैं मुझे भला
पर तेरी गली में गुम जाना भी अच्छा लगता है
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कल बेखुदी में लगा की अकेला हूँ, डर रहा था ,
तो समंदर किनारे आज चाँद मेरे संग चल रहा था :)
प्याले से कुछ बूँद छलकने का गम था ही ,
की देखा आज एक दरिया संग बह रहा था !

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जो बात देती है ख़ुशी , उसी ने कर दिया एक रोज़ बेदम ,
हसरतें जो सुलझाती हैं रास्ते, आज बनी है क्यूँ मन की उलझन ?


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