Wednesday, November 3, 2010

एक सवाल ..


सवाल जनमते रहे
प्रश्नों की दौड़ लगती रही
एक प्रश्न आगे निकल आया
वो मेरा दोस्त भी बना
उसी ने कहा एक रोज़
प्रश्न तो अनंत हैं
और द्विगुणित होना इनकी आदत
उसने और भी पूछा
प्रश्नों के इस दलदल में से
तुमने अब तक कितने प्रश्नों को जिया है?
मैं रहा स्तब्ध
उसी स्ताब्ध्त्ता में मेरे दोस्त प्रश्न ने कहा
नहीं जिया तोह अब मेरे संग जी लो
मैंने उस अजीज़ प्रश्न से कहा
हाँ , अब मैं तुझे जिऊंगा
एक संजीदगी से जिऊंगा
एक आस से तुझे जिऊंगा
अन्य प्रश्न फिर भी उगते रहे,
कई ज्वलित हो भास्मित हुए
कई बार बार देहरी पे आते रहे
मैंने परवाह न करने की ठानी

सुना है विधाता ने उत्तर
यहीं कहीं छिपा रखा है
क्या मालूम क्या होगा
क्षितिज के उस पार
इस पार तो कम से कम मैं हूँ
और है मेरा अजीज ' प्रश्न "
क्या होगा उस पार , ना जाने
अतः
मैं जिऊंगा उस सवाल को
जी भर के जिऊंगा
जिन्दगी की हद तक जिऊंगा
जबाब की सदा आने तक
उसको ही जिऊंगा

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