Wednesday, November 3, 2010

यहीं कहीं से ..

याद नहीं , कब की गैरों ने परवाह हमारी
और गुजारता हूँ दिन मैं औरों की परवाह करते करते ...

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ये झूठ जबान को छोड़े की, पूछ लिया करते थे पहले
अब तो , ये भी बगावत पे उतर आये हैं .......

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'मै हूँ' की शराब में डूबने लगा था मैं
कल लाचारी ने आइना दिखा दिया |
परवाह करते करते मरने लगा था मैं
आज बेपरवाही ने झलक से जीना बता दिया ||

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नए रिश्ते बनाने की होड़ में ऐसा दौड़ा
की कई बुने बुनाए रिश्ते उधड गए
लो जब जेहन में ये ख्याल आ ही गया
तो क्यों ना
उस उधडन पे दो टूक बातों की सीलन चढ़ाउ ..