ना मैं मीरा हूँ,
ना गोपियों सी विकलता मुझमे |
ना मैं सबरी हूँ ,
ना "सुर " सी सहजता मुझमे |
ना मैं अर्जुन हूँ
ना प्रहलाद सी निश्छलता मुझमे |
ना मैं भरतहूँ,
ना बाबा तुलसी की सरलता मुझमे |
ना ही कोई विद्वता ,
ना कोई गुणवत्ता मुझमें |
पर मैं हूँ चाहता
अपने अवगुणों का ही विसर्जन तुझमे
है अभिलाषा की हो कभी
मेरे दो बूँद अश्रुओं का समर्पण तुममे |
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