कहानी तुम्हारी ही तो है, अच्छी लिखना।
मत लिखना इसे चुराए हुए उसूलों से, या किसी के आघात से ।
मत लिखना इसे अपने सही होने के गुमान में, पर लिख लेना ज़रा से पश्चाताप से।
मत लिखना इसे किसी नकली, संवारी हुई अपनी छवि से
बल्कि बिखरे ही सही, लेकिन सच्चे व्यक्तित्व से।
मत लिखना इसे सिर्फ अपने विचारों से, पर लिखना अपनों के ख़यालों से भी।
मत लिखना इसे अपनी झूठी महत्वाकांक्षा से,
पर लिखना तो थोड़े टूटे, तो कुछ पूरे हुए सपनों से।
मत लिखना इसे तर्क की दीवार से, लेकिन तराशे हुए जज़्बात से।
मत लिखना सिर्फ अपने होने के गुमान में और वर्चस्व में,
लेकिन लिखना एक दासत्व के भाव में।
कहानी ऐसे लिखना जो सबकी हो
सच्ची हो, तुम्हारी हो
साफ़ नदी सी, सच्ची, चंचल, नैसर्गिक…
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