Saturday, August 11, 2018

या अल्लाह

करना चाहता था सौदा वो रूहानियत का
जनाब वो मगर सोचता बहुत था
भारी लिबास सी कई लालसाओ का
दिलो की धड़कन से पूरा मेल ना था
जेहन का एक टुकड़ा पकड़ के बैठा था
पुरानी गुत्थी को, परसो के असफल प्रयास को
वो मिलता था कई दफा और अपनी तिरछि मुस्कान में
ना जाने कितनी कहानियां छुपाए था !

पर उस रोज़ मैं सहम सा गया, सोचा
इस जद्दोजहद में, रोजमर्रा की भागमभाग में 
भविष्य की पहेली में, तन्हाई और थोड़ी बेचैनी में
छिपी कहानियां उसके रूह ही को ना ढक दें
उस जुआरी को व्यापारी ना बना दे
वो रूह को तराशने की ख्वाइश,वो लौ बूझ ना जाए
अंदर बसा पीर कभी बाहर ना आ पाए
और वो सिर्फ एक "अच्छा" इंसान बन के रह जाए ! 

या अल्लाह, इसके पहले कोई तूफ़ान आ जाए
सारी बंदिशे टूट जाए, और वो सूफी हो जाए !
KG/Gaurav

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