Thursday, February 1, 2018

कविताओं का यथार्थ

उन्होंने कहा
कविताओं में यथार्थ नहीं होता
मैंने कहा
पर शब्दों का तो कोई स्वार्थ नहीं होता
उत्तर आया
शब्द तो यूँ ही व्यर्थ किए जाते है
सोचा मैंने
शब्द तो जूगार है सिर्फ़
यहाँ तो जज़्बात पिरोए जाते है
भाव, एक झरने की तरह आते है
कुछ शब्द बिटोरे चले जाते है
कही लय में तो कही ऊबड़ खाबड़ टकराते टूटते बिखरते
शब्द तो उन्हें एक रूप देने की नाकाम कोशिश है
रूप तो ना मिला , उन्हें एक बस आयाम मिला
एक पल ठहर के वे ख़ुद से रूबरू हुए

पुनः आवाज़ आई
भावनाओं की शब्दों से अतिशयोक्ति हो गयी
मैंने पुनः कहा
वो जो आपको अतिशयोक्ति लगी
मानो जज़्बात एक बाढ़ तुल्य और शब्द बाँध  हो
वो विचार मानो एक बवंडर , और शब्द उनको बाँधने की असफल कोशिश

 मैंने अंततः  सोचा
बिन जज़्बात शब्दों की तीरंदाज़ी  चले
बेहतर की
जज़्बात शब्दों के बिना हृदय के तकिए संग सोने चले

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