१
तमन्नाओ के पर कहीं थक ना जाए
सो सपने अब चुन के बुनता हूँ
अपने हमसे कहीं खफा ना हो जाए
इसलिए शिकवे अब मन में बुनता हूँ
२
कई शाम गुजरती है इक आह उस पार तक
तब कहीं लगता है की "मैं जिंदा हूँ "।
ख़ुद से वादा किया था कुछ , निभा न सका
इसलिए आजकल "मैं शर्मिंदा हूँ "
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