Monday, November 9, 2009

इसलिए ....


तमन्नाओ के पर कहीं थक ना जाए
सो सपने अब चुन के बुनता हूँ
अपने हमसे कहीं खफा ना हो जाए
इसलिए शिकवे अब मन में बुनता हूँ


कई शाम गुजरती है इक आह उस पार तक
तब कहीं लगता है की "मैं जिंदा हूँ "।
ख़ुद से वादा किया था कुछ , निभा न सका
इसलिए आजकल "मैं शर्मिंदा हूँ "



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