Friday, May 30, 2008

सहसा


धड्कने धीमी पड् के फिर उफनने लगी थी

भीड ने तन्हा धकेल दिया यकायक

मानो सहसा कुछ एहसास दिलाया हो तुमने..


अपने ही हाथो से मिट्टी कोड्ता नन्हे बालक कि तरह

खुद को भरने कि कोशिश मे लग गया था मैँ

मानो सहसा तुम्हारे आने कि आहट सुन ली हो...


फिर पछ्तावे से भरे एक बूत कि तरह

कभी खुद को तो कभी अपने अतीत मे झाँकता

जैसे सहसा नीन्द खुली हो मेरी

और मानो गलतियोँ को तुमने शह दे रखी हो.....


हलक के नीचे एक खालीपन उतरता हुआ

जैसे मैँ एक काँस का प्याला था

और तुम्हारी मदिरा ने मुझे भर रखा था....


परसो पीछे खडी अपनी परछाइ से सिहर गया

ये टुटा हुआ भ्रम था मेरा

या मानो सहसा तुमने रोशनी बिखेर दी हो...


खुद से खुद का छलावा निहारता

फिर उस खाइ को पाटता

मानो सहसा तुमने हाथ बढा दिया हो....

क़ुमार गौरव

2 comments:

faiz rizvi said...

gr8....
bahut der main pata chala...
chalo achcha hai..

faiz rizvi said...

jald hi kumar gaurav kisi book ke front cover per ane wala hai..

ummeed karta hoon..