हर जाती हुई साँस पर
आने वाली एक साँस की आस;
पाने की चाह में
खुद को ही भुला देने का राग,
और कभी सब कुछ खोकर
खुद को पा लेने का विराग।
दिन के बवंडर में जगाए रखता एक अकेलापन
तो भोर के एकांत में, मन में विचारों की भीड़
कुछ खो जाने की गहरी तीस , कुछ न पाने की कुंठा तो
बेफ़िक्री की ठंडी छाँह
ज़िंदगी,
जो कभी लगती सबकुछ है,
तो कभी लगती राख।।
कभी एक सुखद मंच
तो कभी गोरखधंधा ।
एक अधूरी रह गई कविता
या तसल्ली भरा पूरा वाकया
No comments:
Post a Comment