Tuesday, November 3, 2009

परवाना


जी जी के थक लिया हर रोज़ ,
इक शाम उसपे मरना सिखा दे

कभी हंस के , कभी रो के थक लिया मैं,
ऐ मौला , मुझे हंसते हुए रोना सिखा दे !

सलीकों की क़द्र करते इतने दिन बीते ,
इक रोज़ पागल सरीखा दीवाना बना दे !

डर लिया बहुत आग से अब मैं ,
इक रात के लिए मुझे परवाना बना दे!

गौरव

3 comments:

Ritu Singh said...

बहुत खूब ||

Deepak said...

Superb darling...keep it up..

ashutosh said...

सुभान अल्लाह ..